नवंबर 2026 के शुरुआती दिनों में दुनिया जलवायु संकट के एक नए अध्याय में प्रवेश कर चुकी है। वर्ष 2026 अब तक के सबसे गर्म वर्षों में से एक बनने की ओर बढ़ रहा है और सुपर अल नीनो की मजबूत पकड़ के साथ अत्यधिक वर्षा, जानलेवा हीटवेव तथा बाढ़-सूखा के चक्र ने वैश्विक मौसम को अस्थिर कर दिया है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ), कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस, कार्बन ब्रीफ और विभिन्न राष्ट्रीय मौसम एजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार, 2026 में वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से लगभग 1.52 डिग्री सेल्सियस ऊपर रहने का अनुमान है, जो 2024 के रिकॉर्ड के करीब या उससे भी अधिक हो सकता है।
यह रिपोर्ट 2026 के प्रमुख मौसम चरम घटनाओं, उनके क्षेत्रीय प्रभावों, अल नीनो की भूमिका और बढ़ते जलवायु जोखिमों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
सुपर अल नीनो: वैश्विक मौसम का मुख्य चालक
2026 में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो की तीव्रता असाधारण रही। अक्टूबर तक मध्य उष्णकटिबंधीय प्रशांत में समुद्री सतह तापमान असामान्यता 3.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गई, जो पिछले रिकॉर्ड (लगभग 2.75 डिग्री सेल्सियस) को तोड़ रही है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार, नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के दौरान यह विसंगति 3.8 डिग्री सेल्सियस तक जा सकती है। महासचिव सेलेस्टे साउलो ने कहा कि यह पिछले चार दशकों के निगरानी चार्ट से बाहर की स्थिति है। अल नीनो के चरम प्रभाव 2026 के अंत में महसूस होंगे, लेकिन उसके बाद भी लंबे समय तक रहेंगे।
अल नीनो सामान्य तापमान और वर्षा पैटर्न को बाधित करता है। कुछ क्षेत्रों में गंभीर सूखा, दूसरों में भारी वर्षा और बाढ़ तथा बड़े हिस्से में अतिरिक्त गर्मी लाता है। यह जलवायु परिवर्तन से पहले से गर्म हो चुकी पृथ्वी पर प्रभावों को कई गुना बढ़ा देता है। खाद्य सुरक्षा पर भी खतरा मंडरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन के विश्लेषण के अनुसार, सहेल, दक्षिणी अफ्रीका, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा मध्य अमेरिका के शुष्क गलियारे में सूखे का सबसे अधिक जोखिम है।
यूरोप में रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव
2026 की गर्मियां यूरोप के लिए ऐतिहासिक रूप से गर्म रहीं। पश्चिमी यूरोप ने रिकॉर्ड सबसे गर्म गर्मी दर्ज की। कॉपरनिकस के अनुसार, पश्चिमी यूरोप की गर्मी का औसत तापमान 21.7 डिग्री सेल्सियस रहा, जो 1991-2020 औसत से 2.5 डिग्री अधिक है और 2003 के पिछले रिकॉर्ड को तोड़ता है। महाद्वीप के 52 प्रतिशत हिस्से को “बहुत मजबूत” हीट स्ट्रेस का सामना करना पड़ा। फ्रांस ने सबसे गर्म जुलाई दर्ज की (1991-2020 औसत से 3.8 डिग्री अधिक) और स्विट्जरलैंड ने रिकॉर्ड सबसे गर्म गर्मी (औसत 17.2 डिग्री सेल्सियस)।
जून 2026 में यूरोप की हीटवेव ने प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार लगभग 14,000 अतिरिक्त मौतें पैदा कीं। एक विस्तृत अध्ययन में 854 शहरों में जून-अगस्त के दौरान लगभग 50,391 हीट-संबंधी अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाया गया, जिनमें से लगभग दो-तिहाई मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के कारण थीं। यूरोप अब दुनिया का सबसे तेज गर्म होने वाला महाद्वीप है, जो वैश्विक औसत से दोगुने से अधिक दर से गर्म हो रहा है। गर्मी ने ऊर्जा प्रणालियों, कृषि, परिवहन और सार्वजनिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित किया। जंगलों में भीषण आग भी भड़की।
एशिया में चरम मौसम: नेपाल की त्रासदी और भारत की चुनौतियां
एशिया में 2026 ने अत्यधिक वर्षा और बाढ़ के साथ-साथ गर्मी का दोहरा संकट झेला। अगस्त 2026 के अंत में नेपाल में हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर पतन या ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) से जुड़ी भयंकर फ्लैश बाढ़ आई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 1,400 से अधिक लोगों की मौत हुई और हजारों लापता रहे। वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं और अस्थिर हो रहे हैं, जिससे ऐसी घटनाओं का खतरा बढ़ गया है। हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र वैश्विक औसत से तेज गर्म हो रहा है।
भारत में स्थिति चिंताजनक रही। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) और डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट “क्लाइमेट इंडिया 2026” के अनुसार, 2026 के पहले नौ महीनों में भारत ने 92 प्रतिशत दिनों में चरम मौसम का अनुभव किया। इससे 3,220 मौतें हुईं, 4.25 मिलियन हेक्टेयर फसलें क्षतिग्रस्त हुईं और 1.28 लाख से अधिक घर नष्ट हुए। 2022-2026 के पांच वर्षों में 16,000 से अधिक मौतें और 20.6 मिलियन हेक्टेयर फसल नुकसान दर्ज किया गया। फरवरी 2026 भारत का 1901 के बाद सबसे शुष्क और 125 वर्षों में चौथा सबसे गर्म महीना रहा। दक्षिण-पश्चिम मानसून औसत से 13 प्रतिशत कम वर्षा लेकर आया, फिर भी मानसून के सभी 122 दिनों में कहीं न कहीं भारी वर्षा, बाढ़ या भूस्खलन हुआ।
नवंबर 2026 के लिए भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में औसत से कम वर्षा (लॉन्ग पीरियड एवरेज का 77 प्रतिशत से कम) और देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान का पूर्वानुमान जारी किया है। बहुत मजबूत अल नीनो स्थितियां नवंबर-दिसंबर तक बनी रहने की संभावना है। हाल ही में चक्रवात मुरासू और अर्नब ने तटीय क्षेत्रों को प्रभावित किया। बांग्लादेश में भी मानसून की तीव्र वर्षा से बाढ़ आई, जिससे लाखों लोग प्रभावित हुए।
दक्षिण-पूर्व एशिया में गर्मी और वर्षा की कमी ने कृषि तथा जल आपूर्ति पर दबाव बढ़ाया है। इंडोनेशिया में 2015 के बाद सबसे बड़ी जंगल आग भड़की, जिससे धुंध फैल गई। जापान और दक्षिण कोरिया ने भी असाधारण गर्मी दर्ज की।
अफ्रीका और अमेरिका में बाढ़ तथा गर्मी
अफ्रीका में 2026 की शुरुआत दक्षिणी क्षेत्रों में भारी वर्षा और बाढ़ से हुई। जनवरी से अप्रैल तक एस्वातिनी, मेडागास्कर, मलावी, मोज़ाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया, जाम्बिया और जिम्बाब्वे में सैकड़ों मौतें और लाखों लोग प्रभावित हुए। मोज़ाम्बिक सबसे बुरी तरह प्रभावित हुआ। क्लाइमेट चेंज ने दक्षिणी अफ्रीका की वर्षा की तीव्रता को लगभग 40 प्रतिशत बढ़ा दिया। पूर्वी अफ्रीका में नैरोबी में फ्लैश बाढ़ ने दर्जनों जान लीं। पश्चिमी अफ्रीका में भी बाढ़ और गर्मी की चेतावनियां जारी रहीं।
उत्तरी अमेरिका में जून-जुलाई 2026 में पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका और दक्षिणी कनाडा में हीटवेव आई, जिससे तूफान और बिजली कटौती हुई तथा लगभग 5 करोड़ लोग प्रभावित हुए। जुलाई संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए सबसे गर्म महीना रहा। फ्लोरिडा में नवंबर की शुरुआत में फ्लैश बाढ़ आई, जहां मेलबर्न में 89 वर्षों में सबसे अधिक एक दिन की वर्षा (292 मिमी) दर्ज की गई। दक्षिण अमेरिका में भी स्थानीय बाढ़ और सूखे की घटनाएं हुईं।
जलवायु जोखिम और व्यापक प्रभाव
2026 की घटनाएं जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित करती हैं। हीटवेव, बाढ़, सूखा, तूफान और जंगल की आग अब दुर्लभ नहीं बल्कि नए सामान्य का हिस्सा बन रहे हैं। लैंसेट काउंटडाउन 2026 रिपोर्ट के अनुसार हीट से संबंधित मौतों का बोझ बढ़ रहा है। 2023 में रिकॉर्ड 7.10 लाख हीट-संबंधी मौतें हुईं, जिनमें से 70 प्रतिशत से अधिक मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के कारण थीं। काम के घंटों का नुकसान अरबों डॉलर के आर्थिक नुकसान के बराबर है।
ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026 के अनुसार 1995-2024 के बीच 9,700 से अधिक चरम मौसम घटनाओं ने 8.32 लाख से अधिक मौतें और मुद्रास्फीति-समायोजित 4.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का सीधा आर्थिक नुकसान पहुंचाया। बाढ़, तूफान, हीटवेव और सूखा प्रमुख प्रभाव थे।
पृथ्वी की महत्वपूर्ण संकेत (वाइटल साइन्स) में से कई रिकॉर्ड चरम पर पहुंच गए हैं। समुद्री तापमान, ग्रीनहाउस गैस सांद्रता, समुद्र स्तर और ग्लेशियर द्रव्यमान में परिवर्तन चिंताजनक हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी की जलवायु प्रणाली अज्ञात क्षेत्र में प्रवेश कर रही है और प्रतिक्रियाएं हमारी प्रतिक्रिया क्षमता से तेज हो रही हैं।
भविष्य की चुनौतियां और आवश्यक कार्रवाई
अल नीनो के चरम के साथ 2026-2027 में और अधिक तीव्र घटनाओं की आशंका है। पूर्वी अफ्रीका में अधिक वर्षा और बाढ़, दक्षिणी अफ्रीका में सूखा, दक्षिण-पूर्व एशिया में गर्मी तथा वर्षा की कमी और अमेरिका के कुछ हिस्सों में विपरीत पैटर्न की संभावना है। खाद्य उत्पादन, जल उपलब्धता, स्वास्थ्य और आजीविका पर दबाव बढ़ेगा।
विशेषज्ञों का जोर है कि उत्सर्जन में तेजी से कटौती के साथ अनुकूलन उपायों—जैसे हीट एक्शन प्लान, बाढ़ चेतावनी प्रणाली, ग्लेशियर निगरानी, जलवायु-प्रतिरोधी कृषि और बुनियादी ढांचे—की जरूरत है। सीओपी31 जैसे मंचों पर जलवायु परिवर्तन को वैश्विक स्वास्थ्य आपात स्थिति घोषित करने की मांग भी जोर पकड़ रही है।
2026 ने साफ कर दिया है कि जलवायु जोखिम अब भविष्य की आशंका नहीं बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। अत्यधिक वर्षा और हीटवेव का यह चक्र मानवता को याद दिलाता है कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और प्रकृति के साथ संतुलन बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने का समय आ चुका है। बिना त्वरित और समन्वित वैश्विक कार्रवाई के, आने वाले वर्ष और अधिक विनाशकारी साबित हो सकते हैं।
