
संजीव कुमार फिल्म इंडस्ट्री का वो सितारा थे जो लंबे समय तक नहीं चमक सके। उन्होंने कम समय में काफी शानदार काम किया था। करीब 25 साल के करियर में उन्होंने सैकड़ों फिल्मों में काम किया, लेकिन इन फिल्मों में उन्होंने शानदार वैराइटी का प्रदर्शन किया। वो पर्दे पर बेटे, बाप और बुजुर्ग हर तरह के रोल अदा कर चुके थे। पर्दे पर उम्रदराज किरदार अदा करने के पीछे उनकी एक खास विचारधारा थी। एक्टर का मानना था कि वो ज्यादा उम्र तक नहीं जी पाएंगे और इसी वजह से वो फिल्मों के जरिए बुढ़ापे को महसूस करना चाहते थे।
संजीव कुमार ने अपनी फिल्मों के जरिए ये तो साबित कर दिया था कि उस दौर में उनसे वर्सेटाइल एक्टर कोई नहीं था। उन्होंने एक फिल्म में एक या दो नहीं बल्कि 9 तरह के रोल अदा किए थे। संजीव कुमार ने एक फिल्म में 9 तरह के रोल अदा कर अपना नाम हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में दर्ज करा लिया था। इस बात की तो शायद लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि एक फिल्म में एक कलाकार 9 किरदार अदा कर सकते हैं। संजीव कुमार ने इस नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया था।
1 फिल्म में एक्टर ने निभाये थे 9 रोल
ये फिल्म साल 1974 में आई ‘नया दिन नई रात’ है। संजीव कुमार, जया बच्चन स्टारर फिल्म ‘नया दिन नई रात’ में एक्टर ने 9 रोल अदा किए थे। फिल्म भले ही बॉक्स ऑफिस पर औसतन रही लेकिन इसको आज भी याद किया जाता है। फिल्म को समीक्षकों ने खूब सराहा था। यह फिल्म तमिल सिनेमा की क्लासिक ‘नवरथरी’ की हिंदी रीमेक थी, जिसमें नवरस यानी नौ भावों—श्रृंगार, हास्य, करुणा, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शांत—को अलग-अलग किरदारों के जरिए दिखाया गया था।
कहानी में जया बच्चन सुषमा का किरदार निभाती हैं, जो जबरदस्ती की शादी से भाग जाती हैं। अपनी यात्रा में वो अलग-अलग पुरुषों से मिलती हैं—अमीर विधुर, शराबी, मनोचिकित्सक, डाकू, नकली बाबा, कुष्ठ रोगी, थिएटर आर्टिस्ट, शिकारी और आखिर में असली प्रेमी। ये सभी नौ किरदार संजीव कुमार ने खुद निभाए। मेकअप आर्टिस्ट सरोज मोदी ने बिना प्रोस्थेटिक्स के इतने अलग-अलग लुक दिए कि दर्शक हैरान रह गए। दिलीप कुमार ने खुद इस भूमिका के लिए संजीव का नाम सुझाया था। फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग में दिलीप कुमार इतने प्रभावित हुए कि उनकी तारीफ का वॉइसओवर फिल्म में जोड़ दिया गया।
यह प्रदर्शन संजीव कुमार की कला का चरम था। वो न सिर्फ रूप बदलते थे बल्कि आवाज, चाल और भावों में इतना अंतर लाते थे कि लगता था जैसे नौ अलग-अलग एक्टर काम कर रहे हों। आज भी यह फिल्म एक्टिंग के छात्रों के लिए पाठ्यपुस्तक जैसी मानी जाती है।
हेमा मालिनी संग दी थीं कई सुपरहिट

संजीव कुमार और हेमा मालिनी की जोड़ी दर्शकों को बेहद पसंद थी। दोनों ने ‘सीता और गीता’, ‘नया जमाना’, ‘त्रिशूल’ और ‘स्वर्ग नरक’ जैसी फिल्मों में साथ काम किया। ‘सीता और गीता’ (1972) सुपरहिट साबित हुई। रमेश सिप्पी की इस फिल्म में हेमा मालिनी ने डबल रोल निभाया जबकि संजीव कुमार ने रमणिक किरदार अदा किया। फिल्म की केमिस्ट्री इतनी जबरदस्त थी कि दोनों के बीच वास्तविक जीवन में भी नजदीकियां बढ़ गईं।
इसके बाद ‘शोले’ (1975) आई, जो हिंदी सिनेमा की अब तक की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर मानी जाती है। संजीव कुमार ने इसमें ठाकुर बलदेव सिंह का किरदार निभाया—हाथ कट चुके एक पुलिस अधिकारी का दर्द, गब्बर सिंह से बदला लेने की आग और परिवार की याद। ये रोल उनकी उम्र से कहीं ज्यादा परिपक्व था, लेकिन उन्होंने इतनी गहराई से निभाया कि आज भी ठाकुर का नाम लेते ही संजीव कुमार का चेहरा याद आता है। हेमा मालिनी बसंती बनीं। दोनों की जोड़ी ने फिल्म को और यादगार बना दिया।
‘त्रिशूल’ में यश चोपड़ा के निर्देशन में अमिताभ बच्चन और शाही कपूर के साथ संजीव कुमार ने पिता का किरदार निभाया। ‘स्वर्ग नरक’ और ‘नया जमाना’ में भी दोनों की केमिस्ट्री चमकती रही। संजीव कुमार हेमा मालिनी को बहुत चाहते थे। उन्होंने शादी का प्रस्ताव भी दिया, लेकिन शर्त थी कि हेमा एक्टिंग छोड़ दें। हेमा मालिनी अपने करियर को प्राथमिकता देना चाहती थीं। परिवार की आपत्तियां और करियर की मांगों के बीच रिश्ता टूट गया। बाद में हेमा मालिनी ने धर्मेंद्र से शादी कर ली। संजीव कुमार इस धक्के से कभी पूरी तरह उबर नहीं पाए।
सच्चे प्यार को ताउम्र रहे मोहताज
संजीव कुमार का निजी जीवन उतना ही जटिल था जितना उनके किरदार। जन्म 9 जुलाई 1938 को सूरत में हरिहर जेठालाल जरिवाला के रूप में हुआ। परिवार मुंबई आ गया। पिता की दिल की बीमारी से मौत हो गई जब वो सिर्फ 11 साल के थे। परिवार में पुरुषों की जल्दी मौत का इतिहास था। संजीव कुमार को खुद हार्ट अटैक का डर सताता रहता था। एक हस्तरेखा विशेषज्ञ ने भी कहा था कि वो बुढ़ापा नहीं देख पाएंगे। इसी वजह से उन्होंने जवानी में ही बुजुर्ग रोल करने शुरू कर दिए—‘शोले’ में ठाकुर, ‘आंधी’ और ‘मौसम’ में परिपक्व किरदार, ‘त्रिशूल’ में पिता।
प्यार में भी वो हमेशा अधूरे रहे। हेमा मालिनी के अलावा नूतन से भी नजदीकियां बताई जाती हैं। सुलक्षणा पंडित उन पर दीवानी थीं। उन्होंने शादी का प्रस्ताव तक दिया, लेकिन संजीव कुमार ने मना कर दिया। सुलक्षणा ने कभी शादी नहीं की। शबाना आजमी से भी लगाव था, लेकिन मां मुस्लिम बहू को स्वीकार नहीं करना चाहती थीं। संजीव कुमार खुद कहते थे कि परिवार की जिम्मेदारी उन्हें शादी से रोकती है। दोस्तों का कहना था कि वो महिलाओं पर भरोसा नहीं कर पाते थे—उन्हें लगता था कि ज्यादातर उनके पैसे के पीछे हैं।
परिणाम ये हुआ कि वो आजीवन कुंवारे रहे। शराब और अनियमित जीवनशैली ने स्वास्थ्य को और खराब किया। 1976 में पहला हार्ट अटैक आया। अमेरिका में बायपास हुआ। लेकिन 6 नवंबर 1985 को सिर्फ 47 साल की उम्र में बड़े हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई। मौत के बाद भी 10 से ज्यादा फिल्में रिलीज हुईं, आखिरी ‘प्रोफेसर की पड़ोसन’ 1993 में।
करियर की चमक और वैराइटी
संजीव कुमार का करियर 1960 में ‘हम हिंदुस्तानी’ से शुरू हुआ। 1965 में ‘निशान’ में लीड मिला। ‘खीलोना’ (1970) ने उन्हें स्टार बनाया। मुमताज के साथ इस फिल्म में उन्होंने मानसिक रूप से अस्थिर युवक का किरदार निभाया। नेशनल अवॉर्ड ‘दस्तक’ (1970) और ‘कोशिश’ (1972) के लिए मिला। फिल्मफेयर अवॉर्ड ‘शिकार’, ‘आंधी’, ‘अर्जुन पंडित’ समेत कई फिल्मों के लिए।
गुलजार के साथ उनकी जोड़ी खास रही—‘कोशिश’, ‘परिचय’, ‘आंधी’, ‘मौसम’, ‘अंगूर’। ‘अंगूर’ में डबल रोल को फोर्ब्स इंडिया ने भारतीय सिनेमा के 25 सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में शामिल किया। कॉमेडी में ‘मंचली’, ‘पति पत्नी और वो’, ‘बीवी ओ बीवी’, ‘हीरो’। सीरियस में ‘शतरांज के खिलाड़ी’ (सत्यजित रे), ‘विधाता’, ‘नमकीन’।
वो लीड हीरो भी रहे, सपोर्टिंग भी। अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, दिलीप कुमार जैसे दिग्गजों के साथ बराबरी से टिके। ‘शोले’ में ठाकुर का रोल आज भी भारतीय सिनेमा का आइकन है।
विरासत जो आज भी जीवित है
संजीव कुमार सिर्फ एक्टर नहीं थे, वो कलाकार थे जो हर किरदार में खुद को पूरी तरह डुबो देते थे। कम समय में उन्होंने इतना कुछ कर दिखाया कि आज के एक्टर्स भी उनके नाम का सम्मान करते हैं। उनकी फिल्में टीवी और ओटीटी पर आज भी चलती हैं। युवा पीढ़ी ‘शोले’ और ‘अंगूर’ देखकर हैरान होती है कि एक ही व्यक्ति इतने अलग-अलग रूप कैसे निभा सकता है।
उनकी मौत ने इंडस्ट्री को झकझोर दिया। दोस्त शाही कपूर, शत्रुघ्न सिन्हा, सचिन पिल्गावकर आज भी याद करते हैं कि कैसे वो देर रात दोस्तों के साथ बैठते, हंसते और फिर अकेलेपन में डूब जाते। परिवार के तीनों बेटे—संजीव, किशोर और निकुल—कम उम्र में चल बसे।
संजीव कुमार की कहानी सफलता और अधूरेपन का मिश्रण है। पर्दे पर वो हर उम्र, हर भाव के मालिक थे। जिंदगी में सच्चे प्यार और लंबी उम्र दोनों से वंचित रहे। लेकिन उनकी कला अमर है। ‘नया दिन नई रात’ के नौ रोल और हेमा मालिनी के साथ की ब्लॉकबस्टर फिल्में हमेशा याद रहेंगी। वो सुपरस्टार थे जिन्होंने कम समय में बहुत कुछ दिया और सच्चे प्यार को ताउम्र मोहताज रहे।

